Tuesday, July 7, 2020

कविता

पिता के कंधे से लगकर
अर्पण कुमार

हम पाँच बहनों को
बड़ा करते पिता
खर्च बेहिसाब हुए
मगर
हम नदियों को
अपने साथ कुछ ऐसे
लपेटे रहे
कि पंजाब हुए।

# मेरी कविता-शृंखला  'पिता के कंधे से लगकर' की यह चौथी कविता है। यह कविता-शृंखला 'राजस्थान पत्रिका' में प्रकाशित हुई। बाद में, Kumar Anupam  जी के संपादन में आए कविता-संकलन 'प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता' में यह संकलित हुई।
कविता-पोस्टर मे प्रयुक्त पेंटिंग-चित्र गूगल इमेज़ज़ से साभार और कुछ परिवर्तनों सहित...
कविता-पोस्टर 41

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