Saturday, July 11, 2020

कविता-अंश

यात्रा
अर्पण कुमार

बंद कमरे की
शांत और थकी हवा के
बोझिल घूर्णन से
निकल बाहर आकर
यह देखना
कितना आह्लादकारी हो सकता है
कि मुक्त और स्वछंद हवा की चोट
हमारे शरीर के साथ
कैसा संगीत रचती है!
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कविता-पोस्टर 45


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