कविता-अंश
'कुआँ'
अर्पण कुमार
कुआँ ख़ाली है
जैसे माँ की माँग
दोनों के दर्द हैं
अपने-अपने
जानते-समझते हैं
दोनों
एक-दूजे के
सूनेपन को
पटक दिया है लाकर
समय ने
दोनों को
एक ही तलछट पर
एक ने इस घर को
पानी दिया
और दूसरे ने दूध
मगर आज
ये दोनों स्रोत
सूख चुके हैं
अभिशप्त हों मानो
निःशब्द और निश्चेष्ट
पड़े रहने को
निचाट अकेलेपन में।
........
#कविता-पोस्टर
'कुआँ'
अर्पण कुमार
कुआँ ख़ाली है
जैसे माँ की माँग
दोनों के दर्द हैं
अपने-अपने
जानते-समझते हैं
दोनों
एक-दूजे के
सूनेपन को
पटक दिया है लाकर
समय ने
दोनों को
एक ही तलछट पर
एक ने इस घर को
पानी दिया
और दूसरे ने दूध
मगर आज
ये दोनों स्रोत
सूख चुके हैं
अभिशप्त हों मानो
निःशब्द और निश्चेष्ट
पड़े रहने को
निचाट अकेलेपन में।
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