Friday, July 10, 2020

कविता-अंश

स्नान-पर्व
अर्पण कुमार

सूरज की तपिश को
कुछ बढ़ाते
कारण बनते हुए
उसकी ईर्ष्या का
मैंने ख़ूब मला
अपने अंग-प्रत्यंग को
मज़े से झटकता रहा
गीले, सुदीर्घ बालों को
सिर हिला-हिलाकर
किसी सिद्ध
प्रतापी तांत्रिक सा
देर-तलक

प्रकृति अवाक्
देखती रही
मेरी तरंगित
स्नान-लीला की
प्रगल्भता
आबद्ध
किसी सम्मोहन से
भूलकर
अपनी गति
हटकर कुछ देर
अपनी चूल से।
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#कविता-पोस्टर

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