Sunday, July 5, 2020

कविता

पुरुष दंभ
अर्पण कुमार

गौर से सुनो
गहराती अँधेरी रात में
बीतते जाते ख़ामोश पलों को
जिसको चीरती चली आ रही है पास
पानी की गड़गड़ाहट
तुम्हारे कानों तक

तुम्हें पता है अच्छी तरह
गड़-गड़ के इस अनाहूत,
अनवरत स्वर के पीछे दम साधे
किसका आत्मविस्मृत,
हृदयविदारक विलाप है
मगर तुम निस्पंद बैठे हुए हो
बहरे होने का ढोंग किए

मंद-मंद बहती,
स्वयं में सिमटी नदी
जाने कितने युगों से
डूबती-उतराती रही है
अपने ही आँसुओं के सैलाब में

सोचो,
अगर कोई नदी यूँ अश्रुपूरित है
तो परंपरा और इतिहास के
किन कठोरतम
दुराग्रहों और दुरभिसंधियों ने
एक सहज, प्रवहमान नदी को
यूँ ज़ार-ज़ार रुलाया होगा

सोचो,
नदी की शीतलता और मिठास लेकर
उसके देय को सिरे से ख़ारिज करते हुए 
उसकी अवमानना करने के
अपने परंपरागत, रूढ़िजनित पुरुष-दंभ की
कथित गर्वित, अग्रिम किसी पंक्ति में
कहीं तुम भी तो खड़े नहीं हो!
.............. 

कविता-पोस्टर 39


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