कविता
सुख-दुःख
अर्पण कुमार
तुम मिलती रोज़
और मैं लिखता
कुछ-न-कुछ
तुम पर
मेरी उम्र के
वे सर्वाधिक सुखद हिस्से थे
तुम अनुपस्थित रही
लंबे अरसे तक
दिन, हफ़्ते, महीने, बरस...
और मैं लिखता रहा
कुछ-न-कुछ
तुम पर
पहले से कुछ ज़्यादा
मेरी ज़िंदगी की वे
सर्वाधिक अँधेरी
कतरनें रहीं
तुम थी
तब कविता थी
जब तुम नहीं थी,
सुख था
तब कविता थी
जब दुःख था
सुख-दुःख
जो तुमसे थे
कविता
जो तुम पर थी।
.............
कविता-पोस्टर 40
सुख-दुःख
अर्पण कुमार
तुम मिलती रोज़
और मैं लिखता
कुछ-न-कुछ
तुम पर
मेरी उम्र के
वे सर्वाधिक सुखद हिस्से थे
तुम अनुपस्थित रही
लंबे अरसे तक
दिन, हफ़्ते, महीने, बरस...
और मैं लिखता रहा
कुछ-न-कुछ
तुम पर
पहले से कुछ ज़्यादा
मेरी ज़िंदगी की वे
सर्वाधिक अँधेरी
कतरनें रहीं
तुम थी
तब कविता थी
जब तुम नहीं थी,
सुख था
तब कविता थी
जब दुःख था
सुख-दुःख
जो तुमसे थे
कविता
जो तुम पर थी।
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कविता-पोस्टर 40

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