Monday, July 13, 2020

कविता-अंश

जूड़े का अनकुम्हलाया फूल
अर्पण कुमार

मेरे अनहद-नाद!
मेरी चेतना में बस
तुम्हारी और तुम्हारी ही आवाज़ है
कब से..
यह तो मैं नहीं जानती
बस जानती हूँ तो यह
कि तुम्हारी ध्वनि के उत्स में
कहीं मैं स्वयं बैठी रहती हूँ
कि उस ध्वनि के अपनापे को
मैं सदियों से जानती हूँ
कि तुम्हारी-मेरी आवाज़
अपने चरम पर एकमेव हो जाती है 

मेरे प्रिय!
क्या यह सब सच है!
मुझे तो लगता है!!
('मधुमती', उदयपुर के जून 2015 अंक में प्रकाशित)
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कविता-पोस्टर  46

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