Wednesday, July 22, 2020

कविता

ख़ूबसूरत शमादान में 
बड़ी ख़ामोशी से 
जलती है शमा 

परवाने के आने पर
पहरेदारी है 
बेदाग-से किले में ।

                    अर्पण कुमार 


कविता-पोस्टर 


Monday, July 13, 2020

कविता-अंश

जूड़े का अनकुम्हलाया फूल
अर्पण कुमार

मेरे अनहद-नाद!
मेरी चेतना में बस
तुम्हारी और तुम्हारी ही आवाज़ है
कब से..
यह तो मैं नहीं जानती
बस जानती हूँ तो यह
कि तुम्हारी ध्वनि के उत्स में
कहीं मैं स्वयं बैठी रहती हूँ
कि उस ध्वनि के अपनापे को
मैं सदियों से जानती हूँ
कि तुम्हारी-मेरी आवाज़
अपने चरम पर एकमेव हो जाती है 

मेरे प्रिय!
क्या यह सब सच है!
मुझे तो लगता है!!
('मधुमती', उदयपुर के जून 2015 अंक में प्रकाशित)
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कविता-पोस्टर  46

Saturday, July 11, 2020

कविता-अंश

यात्रा
अर्पण कुमार

बंद कमरे की
शांत और थकी हवा के
बोझिल घूर्णन से
निकल बाहर आकर
यह देखना
कितना आह्लादकारी हो सकता है
कि मुक्त और स्वछंद हवा की चोट
हमारे शरीर के साथ
कैसा संगीत रचती है!
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कविता-पोस्टर 45


Friday, July 10, 2020

कविता-अंश

स्नान-पर्व
अर्पण कुमार

सूरज की तपिश को
कुछ बढ़ाते
कारण बनते हुए
उसकी ईर्ष्या का
मैंने ख़ूब मला
अपने अंग-प्रत्यंग को
मज़े से झटकता रहा
गीले, सुदीर्घ बालों को
सिर हिला-हिलाकर
किसी सिद्ध
प्रतापी तांत्रिक सा
देर-तलक

प्रकृति अवाक्
देखती रही
मेरी तरंगित
स्नान-लीला की
प्रगल्भता
आबद्ध
किसी सम्मोहन से
भूलकर
अपनी गति
हटकर कुछ देर
अपनी चूल से।
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#कविता-पोस्टर

Thursday, July 9, 2020

कविता-अंश

'कुआँ'
अर्पण कुमार

कुआँ ख़ाली है
जैसे माँ की माँग
दोनों के दर्द हैं
अपने-अपने
जानते-समझते हैं
दोनों
एक-दूजे के
सूनेपन को
पटक दिया है लाकर
समय ने
दोनों को
एक ही तलछट पर
एक ने इस घर को
पानी दिया
और दूसरे ने दूध
मगर आज
ये दोनों स्रोत
सूख चुके हैं
अभिशप्त हों मानो
निःशब्द और निश्चेष्ट
पड़े रहने को
निचाट अकेलेपन में।
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#कविता-पोस्टर


कविता -अंश

थोड़ा नहीं है 
अर्पण कुमार 

किसी को थोड़ा चाहना 
किसी से थोड़ा पाना 
थोड़ा नहीं है 
एक छतरी में साथ चलते जैसे 
थोड़ा बचना थोड़ा भीगना 
थोड़ा नहीं है 
इतिहास के अधगीले उस खंड को 
अपना बना लेने के लिए ...

कविता-पोस्टर 42


Tuesday, July 7, 2020

कविता

पिता के कंधे से लगकर
अर्पण कुमार

हम पाँच बहनों को
बड़ा करते पिता
खर्च बेहिसाब हुए
मगर
हम नदियों को
अपने साथ कुछ ऐसे
लपेटे रहे
कि पंजाब हुए।

# मेरी कविता-शृंखला  'पिता के कंधे से लगकर' की यह चौथी कविता है। यह कविता-शृंखला 'राजस्थान पत्रिका' में प्रकाशित हुई। बाद में, Kumar Anupam  जी के संपादन में आए कविता-संकलन 'प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता' में यह संकलित हुई।
कविता-पोस्टर मे प्रयुक्त पेंटिंग-चित्र गूगल इमेज़ज़ से साभार और कुछ परिवर्तनों सहित...
कविता-पोस्टर 41