आज लिखी मेरी यह कविता
जिसे दुनिया कहते हैं
अर्पण कुमार
घात-प्रतिघात, छ्ल-छद्म से है भरी-भरी
असहनीय तृष्णा में मगर
संतोष की कोई घूँट भी मिल जाए यहाँ
स्नेह और प्रेम-पगे चंद बोल किसी के
बचा ले जाएँ हमें
हमारे कमज़ोर क्षणों में
लक्ष्य,संधान, अदा,अवसर के चौसर
हर सूँ अक्सर हैं बिछे यहाँ
स्वयं कुछ हासिल करने
तो कभी किसी के हासिल को
छिनने बाबत चलती
अखाड़ेबाज़ी, बहसबाज़ी के शोर में
कलकल, छलछल करती है
यह दुनिया।

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