Thursday, June 25, 2020

कविता 

आर्ट्स फैकेल्टी 
अर्पण कुमार 

कुछ लोग मौके-बेमौके
खेमे बनाते चले गए 
इस तरह छोटे-छोटे  
कई उप-समूह हो गए

अब हमारा भी 
एक उप-समूह है 
लेकिन ठहरिए 
यह अलगाव की नीयत से बना  
कोई उप-समूह नहीं है 
यह उसी बड़े-से समूह का 
अवशेष है 
जिसके  कुछ लोग 
किसी भी खेमे में नहीं गए ।
(कादम्बिनी, फरवरी 2014 में प्रकाशित और 'पोले झुनझुने' काव्य-संग्रह में संकलित)
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