कविता
अर्पण कुमार
कुछ लोग मौके-बेमौके
खेमे बनाते चले गए
इस तरह छोटे-छोटे
कई उप-समूह हो गए
अब हमारा भी
एक उप-समूह है
लेकिन ठहरिए
यह अलगाव की नीयत से बना
कोई उप-समूह नहीं है
यह उसी बड़े-से समूह का
अवशेष है
जिसके कुछ लोग
किसी भी खेमे में नहीं गए ।
(कादम्बिनी, फरवरी 2014 में प्रकाशित और 'पोले झुनझुने' काव्य-संग्रह में संकलित)

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