Thursday, June 25, 2020
कविता
अर्पण कुमार
कुछ लोग मौके-बेमौके
खेमे बनाते चले गए
इस तरह छोटे-छोटे
कई उप-समूह हो गए
अब हमारा भी
एक उप-समूह है
लेकिन ठहरिए
यह अलगाव की नीयत से बना
कोई उप-समूह नहीं है
यह उसी बड़े-से समूह का
अवशेष है
जिसके कुछ लोग
किसी भी खेमे में नहीं गए ।
(कादम्बिनी, फरवरी 2014 में प्रकाशित और 'पोले झुनझुने' काव्य-संग्रह में संकलित)
Wednesday, June 24, 2020
आज लिखी मेरी यह कविता
जिसे दुनिया कहते हैं
अर्पण कुमार
घात-प्रतिघात, छ्ल-छद्म से है भरी-भरी
असहनीय तृष्णा में मगर
संतोष की कोई घूँट भी मिल जाए यहाँ
स्नेह और प्रेम-पगे चंद बोल किसी के
बचा ले जाएँ हमें
हमारे कमज़ोर क्षणों में
लक्ष्य,संधान, अदा,अवसर के चौसर
हर सूँ अक्सर हैं बिछे यहाँ
स्वयं कुछ हासिल करने
तो कभी किसी के हासिल को
छिनने बाबत चलती
अखाड़ेबाज़ी, बहसबाज़ी के शोर में
कलकल, छलछल करती है
यह दुनिया।
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