Tuesday, June 30, 2020

कविता
नदी
अलसायी पड़ी थी 
रेत पर
मैं उसके पास गया
वह उठकर बैठी नहीं
बस सरककर
जगह बनाई 
थोड़ी सी
मेरे बैठने भर

सदियाँ गुज़र गईं
बैठे हुए मुझे 
इस मुद्रा में

नदी का आलस्य बड़ा है
या मेरा ही धैर्य
कुछ अधिक है ।

(कविता-संग्रह 'नदी के पार नदी' में 
अर्पण कुमार)



कविता 

मेरे साथ नदी
मेरे कमरे में आई
और बाक़ी छुटभैये सामानों समेत
लील गई
मेरे बिखरे पन्नों के ढेर को भी
अपनी तेज़ धार में

मेरा इतिहास
नदी
नए सिरे से
लिखना चाहती है ।

( कविता-संग्रह 'नदी के पार नदी' में अर्पण कुमार )

कविता-पोस्टर


Monday, June 29, 2020

कविता

काव्योत्सव 
अर्पण कुमार

लापरवाही से बताया
नदी ने
अपना जन्मदिन
उस दिन
चलताऊ अन्दाज़ में
मैंने मुबारक़बाद दिया उसे

फिर यह
क्योंकर हुआ
कि नदी का जन्मदिन
मेरा काव्योत्सव बन गया । 

(वर्ष 2002 में प्रकाशित अर्पण कुमार के पहले कविता-संग्रह 'नदी के पार नदी' से साभार)

कविता-पोस्टर

Friday, June 26, 2020

'खूँटी'
अर्पण कुमार 

मुझे ज़रूरत थी
एक खूँटी की
टाँग सकता था जिस पर
स्वप्न, यौवन, मुखौटा,
और दर्द भी अपना
मैंने पार की
दीवारें कई
मगर
सपाट थीं सभी
नहीं मिलनी थी
नहीं मिली
कोई खूँटी कहीं। 


Thursday, June 25, 2020

कविता 

आर्ट्स फैकेल्टी 
अर्पण कुमार 

कुछ लोग मौके-बेमौके
खेमे बनाते चले गए 
इस तरह छोटे-छोटे  
कई उप-समूह हो गए

अब हमारा भी 
एक उप-समूह है 
लेकिन ठहरिए 
यह अलगाव की नीयत से बना  
कोई उप-समूह नहीं है 
यह उसी बड़े-से समूह का 
अवशेष है 
जिसके  कुछ लोग 
किसी भी खेमे में नहीं गए ।
(कादम्बिनी, फरवरी 2014 में प्रकाशित और 'पोले झुनझुने' काव्य-संग्रह में संकलित)
.....


Wednesday, June 24, 2020

कविता 

गुणसूत्र
अर्पण कुमार

जो खोट मेरे पुरखों में रहे
वे ही खोट 
कमोबेश मुझमें भी हैं 
नहीं कर रहा मैं  
किसी का चरित्र हनन
बता रहा हूँ बस अपना चरित्र।
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आज लिखी मेरी यह कविता 


जिसे दुनिया कहते हैं
अर्पण कुमार 

घात-प्रतिघात, छ्ल-छद्म से है भरी-भरी
असहनीय तृष्णा में मगर 
संतोष की कोई घूँट भी मिल जाए यहाँ 
स्नेह और प्रेम-पगे चंद बोल किसी के 
बचा ले जाएँ हमें 
हमारे कमज़ोर क्षणों में 
लक्ष्य,संधान, अदा,अवसर के चौसर 
हर सूँ अक्सर हैं बिछे यहाँ 
स्वयं कुछ हासिल करने 
तो कभी किसी के हासिल को 
छिनने बाबत चलती 
अखाड़ेबाज़ी, बहसबाज़ी के शोर में 
कलकल, छलछल करती है 
यह दुनिया।