डायरी में दुनिया/अर्पण कुमार
01 जुलाई 2015
पैदल चलना, कनपटी,गर्दन और रीढ़ से पसीना बहाना मात्र नहीं है, बल्कि अपने पूरे शरीर के वज़न को अपने तलवे पर ढोते हुए कदम दर कदम आगे बढ़ना भी है।आदमी अपना कूली स्वयं है। चलता हुआ आदमी कुछ सोचता भी जाता है। सो,यह वज़न शरीर का है और सोच का भी। वज़न उठाना हमेशा कोफ़्त का विषय रहा है। वज़न आखिर वज़न है, फिर चाहे वह अपना है या दूसरों का।सोचता हूँ,आजकल कई लोग,शरीर, सोच और सामान तीनों से भारी होते जा रहे हैं।शरीर के बढ़ते वज़न की उन्हें जब तब चिंता हो जाती है,मगर सोच के बढ़ते वज़न का प्रदर्शन अकुंठित रूप से जारी है।वे भूल जाते हैं कि रास्ता हो या जीवन,आगे बढ़ने के लिए झुकना ज़रूरी है।वज़न कम करना भी।
आज शाम में आसपास के दो तीन चक्कर लगाए।काम के सिलसिले में ही।वैसे भी,पैदल चलना मुझे हमेशा से ही पसंद है।
शाम में घर आते ही दोनों बच्चों को सैलून ले जाना था।बाल बड़े होने से वे आज स्कूल नहीं जा सके थे। हालांकि,ग्रीष्म अवकाश के बाद आज पहला दिन था।पढ़ाई होने की उम्मीद कम ही थी। छोटा बेटा, रास्ते में बोल रहा था,'पहले मेरे बाल कटेंगे।कुर्सी पर पहले मैं बैठूँगा'।संयोग से उसे सीट मिल भी गई और वह धम्म से बैठ गया। मगर उसका यूं बैठना बड़े बेटे को नागवार गुज़रा।जबरदस्ती तो नहीं की, मगर उसके पास जाकर कुछ ऐसा कहा कि वह कुर्सी से उतर गया।मगर उतरते ही उसकी आंखें छलछला गईँ।वह रोने लगा। बड़े भाई के प्रति उसने अपना जहाँ फ़र्ज़ निभाया, वहीं मिली हुई कुर्सी का छिनना उसे गंवारा नहीं हुआ। मैं क्या करता...कुछ देर में दोनों एक ही होंगे। फिर भी,यथासंभव,मैंने उसकी तरफ अपनी संवेदना ज़रूर जाहिर की। वह चुप हो गया। बच्चे के लिए इतना समर्थन भी कम नहीं होता है।
.....
घर में सब्जी नहीं थी।पैदल चलकर पास स्थित बंगाली मार्केट में गया।कुछ सब्जियाँ खरीदीं।आलू,प्याज,टमाटर,लालसाग,बैंगन,भिंडी,
परवल और हरी मिर्च।
रास्ते में सोच रहा था....जब हम बाज़ार कुछ खरीदने जाते हैं, तो हमारे भीतर विक्रेताओं की कुछ पूर्व निर्धारित छवियाँ क्रमशः स्पष्ट होती जाती हैं। वह सांवली,दुबली और गोल चहरे वाली महिला आज कैसी लग रही होगी,उसके स्कूल जाते बच्चे,शाम के समय, अपनी माँ का किस तरह हाथ बटा रहे होंगे...बिहार के सहरसा से कब के आए और यहाँ जयपुर के बाईस गोदाम में अपना घर बना कर रहे,बड़े दाँतों वाले झा जी की व्यावसायिक बुद्धि आज क्या गुल खिलाएगी, अपनी बूढ़ी माँ के साथ लड़ती झगड़ती और भर मुँह गुटका चबाती मोटे गालों वाली लड़की की तेज़ आक्रामक नज़रों से खुद को कैसे बचाऊँगा...बनियान मात्र पहने सूखी मछलियाँ बेच रहे सांवले लड़के आज आपस में क्या मटरगश्ती कर रहे होंगे... बाज़ार के बीचों बीच चल रहे और दुकानों तक बिजली पहुंचा रहे डीजल इंजन का धुंआ आज पुनः मुझे मेरे बचपन के किन कोरों को छूएगा....आदि आदि। मगर आपके ख्याल से दुनिया कहाँ चलती है!वह साँवली स्त्री आज गायब थी,उसके बच्चे भी नहीं थे।दुकान पर उसका पति था, सुदर्शन मगर ग्राहक को बाँध लेने की हुनर से कोसों दूर।झा जी का ठीया सही सलामत था, मगर वे खुद दिखाई नहीं दिए।एक दो बार आवाज़ लगाई,मगर उन्हें नहीं आना था, सो वे नहीं आए।सांवले लड़कों का झुंड दो गुटों में बंटा दिखा। कुछ चाउमिन के ठेले के पास खड़े थे तो कुछ नई खरीदी बाईक के ऊपर लदे थे।उम्मीद करता हूँ कि उनका यह विलगाव महज आकस्मिक हो।डीजल इंजन का धुंआ एक बार नथुने में आने दिया।ओह,कितनी परिचित गंध है यह!
.....
ज्योति नगर में ही एक संस्था की जमीन खाली थी,तब कई ऊँट वहां अपने मालिकों के साथ रहा करते थे, मगर अब खाली ज़मीन पर संस्था की बहुमंजिला ईमारत बन रही है।सो, ऊँटों और उनके मालिकों को वह जगह छोड़नी पड़ी।जब सब्जी मंडी से लौट रहा था,तो एक दो ऊंटों को सड़क किनारे की पगडंडी पर बंधा/बैठा पाया।लंबी गर्दन वाले ऊंटों को अपने नथुने को हल्का उठाकर धीरे धीरे पगुराते हुए देखना अच्छा लगता है।सड़क से ऊँचे एक बड़े से चबूतरे से हटकर यहाँ सड़क किनारे गन्दगी के समीप और आते जाते वाहनों के शोर के बीच बैठना,शायद उन्हें भी पसंद न आ रहा हो।मगर इंसानों की हसरत,ऊँट के कूबड़ की तरह जब ऊंची होने लगे, तब ऊँट को ही अपनी गर्दन झुकानी पड़ेगी।विस्थापित ऊँट देर रात तक मेरे ज़ेहन में बैठे और पगुराते रहे।
01 जुलाई 2015
पैदल चलना, कनपटी,गर्दन और रीढ़ से पसीना बहाना मात्र नहीं है, बल्कि अपने पूरे शरीर के वज़न को अपने तलवे पर ढोते हुए कदम दर कदम आगे बढ़ना भी है।आदमी अपना कूली स्वयं है। चलता हुआ आदमी कुछ सोचता भी जाता है। सो,यह वज़न शरीर का है और सोच का भी। वज़न उठाना हमेशा कोफ़्त का विषय रहा है। वज़न आखिर वज़न है, फिर चाहे वह अपना है या दूसरों का।सोचता हूँ,आजकल कई लोग,शरीर, सोच और सामान तीनों से भारी होते जा रहे हैं।शरीर के बढ़ते वज़न की उन्हें जब तब चिंता हो जाती है,मगर सोच के बढ़ते वज़न का प्रदर्शन अकुंठित रूप से जारी है।वे भूल जाते हैं कि रास्ता हो या जीवन,आगे बढ़ने के लिए झुकना ज़रूरी है।वज़न कम करना भी।
आज शाम में आसपास के दो तीन चक्कर लगाए।काम के सिलसिले में ही।वैसे भी,पैदल चलना मुझे हमेशा से ही पसंद है।
शाम में घर आते ही दोनों बच्चों को सैलून ले जाना था।बाल बड़े होने से वे आज स्कूल नहीं जा सके थे। हालांकि,ग्रीष्म अवकाश के बाद आज पहला दिन था।पढ़ाई होने की उम्मीद कम ही थी। छोटा बेटा, रास्ते में बोल रहा था,'पहले मेरे बाल कटेंगे।कुर्सी पर पहले मैं बैठूँगा'।संयोग से उसे सीट मिल भी गई और वह धम्म से बैठ गया। मगर उसका यूं बैठना बड़े बेटे को नागवार गुज़रा।जबरदस्ती तो नहीं की, मगर उसके पास जाकर कुछ ऐसा कहा कि वह कुर्सी से उतर गया।मगर उतरते ही उसकी आंखें छलछला गईँ।वह रोने लगा। बड़े भाई के प्रति उसने अपना जहाँ फ़र्ज़ निभाया, वहीं मिली हुई कुर्सी का छिनना उसे गंवारा नहीं हुआ। मैं क्या करता...कुछ देर में दोनों एक ही होंगे। फिर भी,यथासंभव,मैंने उसकी तरफ अपनी संवेदना ज़रूर जाहिर की। वह चुप हो गया। बच्चे के लिए इतना समर्थन भी कम नहीं होता है।
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घर में सब्जी नहीं थी।पैदल चलकर पास स्थित बंगाली मार्केट में गया।कुछ सब्जियाँ खरीदीं।आलू,प्याज,टमाटर,लालसाग,बैंगन,भिंडी,
परवल और हरी मिर्च।
रास्ते में सोच रहा था....जब हम बाज़ार कुछ खरीदने जाते हैं, तो हमारे भीतर विक्रेताओं की कुछ पूर्व निर्धारित छवियाँ क्रमशः स्पष्ट होती जाती हैं। वह सांवली,दुबली और गोल चहरे वाली महिला आज कैसी लग रही होगी,उसके स्कूल जाते बच्चे,शाम के समय, अपनी माँ का किस तरह हाथ बटा रहे होंगे...बिहार के सहरसा से कब के आए और यहाँ जयपुर के बाईस गोदाम में अपना घर बना कर रहे,बड़े दाँतों वाले झा जी की व्यावसायिक बुद्धि आज क्या गुल खिलाएगी, अपनी बूढ़ी माँ के साथ लड़ती झगड़ती और भर मुँह गुटका चबाती मोटे गालों वाली लड़की की तेज़ आक्रामक नज़रों से खुद को कैसे बचाऊँगा...बनियान मात्र पहने सूखी मछलियाँ बेच रहे सांवले लड़के आज आपस में क्या मटरगश्ती कर रहे होंगे... बाज़ार के बीचों बीच चल रहे और दुकानों तक बिजली पहुंचा रहे डीजल इंजन का धुंआ आज पुनः मुझे मेरे बचपन के किन कोरों को छूएगा....आदि आदि। मगर आपके ख्याल से दुनिया कहाँ चलती है!वह साँवली स्त्री आज गायब थी,उसके बच्चे भी नहीं थे।दुकान पर उसका पति था, सुदर्शन मगर ग्राहक को बाँध लेने की हुनर से कोसों दूर।झा जी का ठीया सही सलामत था, मगर वे खुद दिखाई नहीं दिए।एक दो बार आवाज़ लगाई,मगर उन्हें नहीं आना था, सो वे नहीं आए।सांवले लड़कों का झुंड दो गुटों में बंटा दिखा। कुछ चाउमिन के ठेले के पास खड़े थे तो कुछ नई खरीदी बाईक के ऊपर लदे थे।उम्मीद करता हूँ कि उनका यह विलगाव महज आकस्मिक हो।डीजल इंजन का धुंआ एक बार नथुने में आने दिया।ओह,कितनी परिचित गंध है यह!
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ज्योति नगर में ही एक संस्था की जमीन खाली थी,तब कई ऊँट वहां अपने मालिकों के साथ रहा करते थे, मगर अब खाली ज़मीन पर संस्था की बहुमंजिला ईमारत बन रही है।सो, ऊँटों और उनके मालिकों को वह जगह छोड़नी पड़ी।जब सब्जी मंडी से लौट रहा था,तो एक दो ऊंटों को सड़क किनारे की पगडंडी पर बंधा/बैठा पाया।लंबी गर्दन वाले ऊंटों को अपने नथुने को हल्का उठाकर धीरे धीरे पगुराते हुए देखना अच्छा लगता है।सड़क से ऊँचे एक बड़े से चबूतरे से हटकर यहाँ सड़क किनारे गन्दगी के समीप और आते जाते वाहनों के शोर के बीच बैठना,शायद उन्हें भी पसंद न आ रहा हो।मगर इंसानों की हसरत,ऊँट के कूबड़ की तरह जब ऊंची होने लगे, तब ऊँट को ही अपनी गर्दन झुकानी पड़ेगी।विस्थापित ऊँट देर रात तक मेरे ज़ेहन में बैठे और पगुराते रहे।

